Abstract
संताली साहित्य
दिव्या मुर्मू, शोधार्थी, स्नातकोत्तर संताली विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड)
ईमेल: divyamurmu93@gmail.com
साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य एवं समाज का अविच्छिन्न संबंध होता है। समाज यदि शरीर है तो साहित्य उसकी आत्मा। संताली साहित्य भारत की एक प्राचीन और समृद्ध साहित्यिक परंपरा का हिस्सा है, जो संताल समुदाय की संस्कृति, भाषा और जीवनशैली को प्रतिबिंबित करता है। संताली भाषा, जो आॅस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित है। मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, ओडिषा, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा आदि राज्यों में बोली जाती है। यह भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रीय भाषाओं में से एक है, जिसे आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। संताली साहित्य की खासियत इसकी मौखिक परंपरा और बाद में विकसित लिखित रूप में निहित है, जो संताल लोगों के इतिहास, परंपराओं और विश्वासों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। संताली साहित्य का प्रारंभ मौखिक परंपरा से हुआ। संताल समुदायों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोककथाएँ, गीत, कहानियाँ और परंपराएँ मैखिक रूप में प्रसारित होती रहीं। यूरोपीय मिशनरियों ने संताली भाषा को समझने और इसे लिखित रूप देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संताली साहित्य को एक नई पहचान तब मिली जब 1925 में संताल विद्वान पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ‘ओल चिकि’ लिपि का आविष्कार किया। यह लिपि संताली भाषा की ध्वनियों को सटीक रूप से व्यक्त करने के लिए बनाई गई थी और आज यह संताली साहित्य की आधिकारिक लिपि के रूप में स्वीकार की जाती है। ‘ओल चिकि’ के विकास ने संताली साहित्य के लिखित रूप को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संताली साहित्य में लोक साहित्य और शिष्ट साहित्य दोनों का समावेष है। लोक साहित्य में संताल लोगों के लोकगीत, नृत्य-गीत (जैसे बाहा और सोहराय), पहेलियाँ और कहानियाँ षामिल है, जो उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों को दर्षाते हैं। ये रचनाएँ प्रकृति, खेती, त्योहारों और सामुदायिक जीवन से प्रेरित होती है। दूसरी ओर शिष्ट साहित्य में कविताएँ, नाटक, उपन्यास और निबंध षामिल हैं, जो आधुनिक संताली लेखकों द्वारा लिखे गए हैं। संताली साहित्य की एक खास विषेषता यह है कि यह संताल लोगों के संघर्ष, उनकी पहचान और सामाजिक मुद्दों को उजागार करता है। यह साहित्य अक्सर आदिवासी जीवन के प्रति संवेदनशीलता और उनके अधिकारों की वकालत करता है। इसके अलावा, संताली भाषा में समृद्ध व्याकरणिक संरचना और शब्दावली है, जो इसे साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त बनाती है।
संताली साहित्य को समृद्ध करने में कई लेखकों और विद्वानों का योगदान रहा है। आज संताली साहित्य न केवल भारत में, बल्कि बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों में भी फल फूल रहा है। ओल चिकि लिपि के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों का उपयोग और आॅनलाइन प्रकाशन ने इसे और व्यापक बनाया है। हालांकि, चुनौतियाँ भी कम नहीं है। संताली साहित्य को मुख्यधारा में लाने के लिए अधिक प्रकाशन, अनुवाद और पाठकों तक पहुँच की आवष्यकता है। संताली साहित्य संताल समुदाय की आत्मा का दर्पण है। यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के साथ-साथ आधुनिकता के साथ कदम मिलाने का प्रयास करता है। भविष्य में यदि इसे उचित प्रोत्साहन और संसाधन मिले, तो यह विष्व साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। संताली साहित्य एक ऐसी धरोहर है जो न केवल संताल लोगों के जीवन को उजागार करता है, बल्कि भारत की बहु-सांस्कृतिक विविधता को भी समृद्ध करता है। यह साहित्य हमें यह सिखाता है कि भाषा और संस्कृति का संरक्षण कितना महत्वमपूर्ण है। संताली साहित्य में प्रकृति का गहरा चित्रण मिलता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ और पषु-पक्षी संताली संस्कृति और साहित्य के अभिन्न अंग है। संताली साहित्य में सामुदायिक जीवन, सामाजिक रीति-रिवाजों और लोककथाएँ संताली संस्कृति और इतिहास के महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इनमें प्रेम, विवाह, त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक जीवन का वर्णन मिलता है। संताली लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से संताली समाज की समस्याओं और अकांक्षाओं को व्यक्त कर रहे हैं। संताली साहित्य संताली संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संताली भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में भी योगदान देता है। संताली साहित्य, संताली भाषा में लिखित साहित्य को संदर्भित करता है। संताली साहित्य की जड़ें प्राचीन काल में देखी जा सकती है जब यह मुख्य रूप से मौखिक था। संताल समुदाय में मौखिक साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है।
संताली साहित्य में कुछ प्रमुख तत्व हैं जो इसे अन्य भारतीय भाषाओं से अलग बनाते हैं:
• लोकगीत और लोककाव्य: संताली साहित्य में लोकगीतों का बहुत महत्व है। इन गीतों में आदिवासी जीवन की सच्चाई, संघर्ष और संस्कृति का जीवंत चित्रण होता है। विशेष रूप से, इन गीतों में प्रकृति और आध्यात्मिकता का गहरा संबंध दिखाया जाता है।
• कविता और काव्यषास्त्र: संताली कविता जीवन के विभिन्न पहलुओं का सजीव चित्रण करती है। इन कविताओं में आदिवासी संस्कृति, संघर्ष और सामाजिक मुद्दों का खुलासा किया जाता है।
• कहानियाँ और उपन्यास: संताली साहित्य में कहानियाँ और उपन्यासों के रूप में जन जीवन की वास्तविकताओं को प्रस्तुत किया जाता है। ये रचनाएँ न केवल मनोरंजन प्रदान करती है बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेष भी देती है।
आज के समय में संताली साहित्य का विकास तेजी से हो रहा है। संताली भाषा को मान्यता मिलने के बाद अधिक से अधिक लेखक और कवि इस क्षेत्र में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा, संताली साहित्य को अन्य भाषाओं में अनुवादित किया जा रहा है, जिससे इसकी पहुँच और प्रभावा बढ़ रहा है। इसके साथ ही, संताली साहित्य की प्रमुखता अब शैक्षिक संस्थानों में भी बढ़ रही है। संताली साहित्य न केवल संताल समुदाय के जीवन की कहानी है बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक धरोहर और पंरपराओं का संरक्षण भी है। संताली साहित्य संताली लोगों को अपनी पहचान और गौरव का अनुभव कराता है। यह भारतीय साहित्य की बहुलवादी प्रकृति को दर्षाता है और भारतीय संस्कृति में संताली समुदाय के योगदान को भी दिखाता है। संताली साहित्य एक जीवंत और प्रगतिशील साहित्य है, जो लगातार विकसित हो रहा है। यह साहित्य संताली लोगों की सांस्कृतिक पहचान और विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संताली साहित्य में जीवन के भावों, विचारों परिस्थितियों एवं घटनाओं का विषय मिलता है। संताली साहित्य दो भागों में विभाजित किया गया है - होड़ साँवहेंत् (लोक साहित्य), ओल साँवहेंत् या सिरजाव साँवहेंत् (लिखित साहित्य)
संताली होड़ साँवहेंत् (संताली लोक साहित्य): लोक साहित्य का षाब्दिक अर्थ है ‘‘ग्राम के लोगों का ज्ञान’’। संताली भाषा में ‘लोक’ षब्द का अर्थ है ‘होड़’ अर्थात् इससे मानव जाति को बोध होता है और साहित्य शब्द का साधारण अर्थ है-दूसरों की भलाई करना। विद्वानों ने साहित्य को ‘स हितम् साहित्यम्’ भी कहा है अर्थात दूसरों की हित या भलाई ही साहित्य है। अतः हम कह सकते हैं कि मानव जाति के भलाई के लिए जो है वही साहित्य है। संताली लोक साहित्य में मानव की परंपरागत भावनाएँ एवं चेतनागत सभी अभिव्यक्ति का लेखा-जोखा निहित है। इसमें संताल जाति के विष्वास, रीति-रिवाज, कहानियाँ, कहावतें, संगीत, लौरी, मुहावरें, लोकोक्ति आदि आते हैं। संताली लोक साहित्य में संताली लोक संस्कृति का एक अंग है। इसलिए लोक साहित्य में जातीय संस्कार, पुर्वजों की कथाएँ, बिनती, लोकाचार के रीति-रिवाजें, समाजकि व्यवस्थाएँ, पर्व-त्योहार, विवाह के गाथा, कथा, पहेलियाँ आदि पाये जाते हैं। संताली लोक साहित्य की ये सारी विधाएँ सदियों से लेकर वर्तमान समय तक सुशोभित करते आ रहे हैं। लोक साहित्य प्रायः अलिखित है। श्रुतिरूप में कहानी, गीत, कथा, गाथा, संगीत आदि युगों से संताली लोक जीवन में चले आ रहे हैं। इसलिए संताली लोक साहित्य अधिकांश अलिखित है। लोक साहित्य की कुछ संकलित, संपादित, संग्रहित पुस्तकें भी देषी-विदेशी विद्वानों ने प्रकाषित किया है। आधुनिक युग में बहुत सारी लोक तथ्य लुप्त होते जा रहे हैं या कहे चर्चा कम होती जा रही है। लोकसाहित्य में रचियता का नाम ज्ञात नहीं होता क्योंकि यह व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं है बल्कि सम्पूर्ण समाज की सम्पत्ति है। लोकसाहित्य का तात्पर्य उस साहित्य से है जो मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गाकर या सुनकर जीवित रखी गई है। इस प्रकार से कह सकते हैं कि वास्तव में लोक-साहित्य लोक जीवन की अभिव्यक्ति है। लोक साहित्य को लोक जीवन में घनिष्ट सम्बन्ध रखता है। लोक साहित्य को अंग्रेजी में ‘फोक लिटेरेचर’ का षाब्दिक अनुवाद माना है। ‘‘संताली लोक साहित्य, लोक जीवन का दर्पण है।’’
संताली ओल साँवहेंत् (संताली लिखित साहित्य): संताली शिष्ट साहित्य के अन्तर्गत उपन्यास, कहानी, नाटक, आलेख, कविता, आधुनिक गीत आदि आते हैं । शिष्ट साहित्य वह सात्यि है जो लिखित रूप में उपलब्ध होता है। इसके रचियता का नाम, पता आदि ज्ञात होता है।
संताली लोकसाहित्य के रूप
लोकगीत: संताली लोकगीत, संताल समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा है। संताली लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि संतालियों के जीवन, प्रकृति, प्रेम और सामाजिक मूल्यों को भी व्यक्त करते हैं। संताली लोकगीत अपनी सादगी और गहरी भावनाओं के लिए प्रसिद्ध है। इन गीतों में प्राकृतिक तत्वों जैसे नदियों, जंगलों और पहाड़ों का उल्लेख बार-बार मिलता है, जो संतालियों के प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। इनके बोल आमतौर पर काव्यात्मक होते हैं और जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे खेती, त्योहार और पारिवारिक बंधनों को चित्रित करते हैं। संगीत में मांदर, नगाड़ा और बांसुरी जैसे पारंपारिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। जो इन गीतों को एक अनूठा स्वर प्रदान करते हैं। संताली लोकगीत विभिन्न अवसरों पर गाये जाते हैं। जैसे-बाहा, सोहराय, दाँसाय, छाटियार, बापला, कृषि कार्य के दौरान गीत गाना आदि।
लोककथा: संताली लोक कथाएँ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। संताली लोक कथाएँ मैखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं और इनमें संताल समुदाय के जीवन, मूल्यों, विश्वासों और प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव की झलक मिलती है। संताली लोक कथाएँ आमतौर पर सरल लेकिन गहरे अर्थ वाली होती है। इनमें प्रकृति, पषु-पक्षी, मानव जीवन और अलौकिक षक्तियों की कहानियाँ षामिल होती हैं। ये कथाएँ न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि नैतिक षिक्षा और सामाजिक नियमों को समझाने का भी माध्यम रही है। संताली लोककथाएँ निम्नलिखित श्रेणियों में पायी जाती है-
ऽ सृष्टि कथाएँ
ऽ देव कथाएँ
ऽ गोत्र कथाएँ
ऽ भाई-बहन की कथाएँ
ऽ पेड़-पौधे से सम्बन्धित कथाएँ
ऽ जीव कथाएँ
लोकगाथा: संताली लोक साहित्य में दो प्रकार के गाथा पाये जाते हैं। यथा-धर्म गाथा तथा वीर
गाथा। धर्म गाथा धर्म आधारित है तथा वीर गाथा में वीरों के वर्णन मिलते हैं।
कुदुम (पहेली): संताली पहेलियाँ संताली संस्कृति का एक अनुठा और रोचक हिस्सा है। संताली भाषा में इसे ‘कुदुम’ कहा जाता है। संताली पहेलियाँ संताल लोगों की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये पहेलियाँ न सिर्फ बच्चों और बड़ों के लिए मनोरंजन का साधन है, बल्कि ये उनकी सोचने की क्षमता भी तेज करती है। संताली भाषा में ये पहेलियाँ आमतौर पर काव्यात्मक षैली में होती है और इनमें प्रकृति, जानवरों और रोजमर्रा की वस्तुओं से जुड़े संकेत छिपे होते हैं। संताल समुदाय में पहेलियाँ सामाजिक सामारोह, उत्सवों या साधारण बातचीत के दौरान पूछी जाती है। संताली भाषा के कुछ कुदुम इस प्रकार है-
रापुत ओड़ाक् रे कोक् को एनेच् कान - खाजाड़ी आता (मुड़ी भुनना)
हाती लाच् बिकोर बोकोर - बोड़ (पुवाल का रस्सी)
सेरमा रे बेत् टुकुच - तिरिल जो (केंदु फल)
गाडा-गाडा ते बाटी हारूप - होरो (कछुआ)
गाडा-गाडा ते गोंयठा चापे - रोट (मेंढक)
मेनकाथा (लोकोक्ति/कहावते): लोकोक्तियाँ/कहावतें को संताली में ‘मेनकाथा’ कहा जाता है। ‘मेनकाथा’ का लोकसाहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। सामान्यतः लोकोक्तियाँ शिक्षा मूलक बातें होती है। इसका उपयोग बड़े-बुजुर्ग किसी को समझाने के लिए करते हैं। लोकोक्तियाँ मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज में निरंतर चली आ रही है। ये कहावतें संक्षिप्त होती है, लेकिन इनमें जीवन का गहरा अनुभव और ज्ञान छिपा होता है। लोकोक्तियों के जरिए समाज में नैतिकता, मेहनत और एकता जैसे मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है। संताल समुदाय के लोग अपने दैनिक व्यवहार में अनेक ऐसे उक्ति का प्रयोग करते हैं, जिससे इनके कथन में षक्ति आ जाती है । जिसका श्रोताओं पर जामकर प्रभाव पड़ता है। संताली भाषा के कुछ ‘मेनकाथा’ इस प्रकार है-
ऽ आरेच् दाक् आर लायचाल काथा दो हासु गेया।
ऽ एकेन ठिलि दो साडे गेया।
ऽ दिकु पेड़ा, जानुम झानटी।
ऽ मोचा काथा गे सिबिला, दाका उतु दो बाडÛ।
ऽ होय जिवी हासा होड़मो।
भेनताकाथा (मुहावरे): मुहावरे किसी भी भाषा के वे खास वाक्यांष होते हैं, जो शाब्दिक अर्थ से अलग एक विशेष भाव या अर्थ व्यक्त करते हैं। संताली के कुछ मुहावरे नीचे दी जा रही है-
मेत् मारसाल होड़ - ओलोक् होड़ (षिक्षित व्यक्ति)
पे बोहोक्आना होड़ - हाड़ाम होड़ (बजुर्ग व्यक्ति)
काथा आतार बाड़ाय - लाईबाड़ा (आफवाह फैलाना)
तोवा काटकोम - आडी कामजोर (बहुत कामजोर)
साकाम् ओड़ेच् - बापाग (विवाह विच्छेद)
सेरमापुरी सेनोक् - गोच् (मृत्यु होना)
Refrences :
1. परमार डाॅ. श्याम, भारतीय लोक साहित्य, पृ.सं. - 53
2. डाॅ. सत्येंद्र, लोकसाहित्य विज्ञान, पृ.सं. - 462
3. टुडू डाॅ. कृष्ण चन्द्र,संताली लोक साहित्य, संताली साहित्य परिषद (2008), रांची (झारखण्ड), पृ.सं.-12-15
4. वही, पृ.स. -26
5. वही, पृ.सं.-64
6. वही, पृ.सं.-73-76
7. हेम्ब्रम डाॅ. रतन, संताली लोकगीतों में साहित्य और संस्कृति (2005), झारखण्ड झरोखा, रांची (झारखंड), , पृ.सं. - 44-50
8. कुमार डाॅ. विनय, संताली भाषा लोकगीत एवं नृत्य (2014), झारखण्ड झरोखा, रांची (झारखंड), पृ.सं. - 95
9. वही, पृ.सं. - 106-110
10. हांसदा जितेन्द्र नाथ, संताली भाषा व्याकरण एवं साहित्य, षिवांगन पब्लिकेषन 2015, रांची (झारखंड), पृ.सं. -37-41
11. किस्कू फ्रांसिस, सम्पर्क पब्लिकेषन, पृ.सं0 - 160-161