UGC Approved Journal no 63975(19)
New UGC Peer-Reviewed Rules

ISSN: 2349-5162 | ESTD Year : 2014
Volume 13 | Issue 4 | April 2026

JETIREXPLORE- Search Thousands of research papers



WhatsApp Contact
Click Here

Published in:

Volume 11 Issue 3
March-2024
eISSN: 2349-5162

UGC and ISSN approved 7.95 impact factor UGC Approved Journal no 63975

7.95 impact factor calculated by Google scholar

Unique Identifier

Published Paper ID:
JETIR2403104


Registration ID:
533756

Page Number

b24-b31

Share This Article


Jetir RMS

Title

स्वच्छ पर्यावरण के लिए सार्थक प्रयास: अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अवधारणा

Authors

Abstract

सारांश – प्राचीन काल से ही हमारे धर्मों में वृक्षों की पूजा का महत्त्व रहा है। वैदिक साहित्य में भी इस बात का प्रमाण स्पष्ट रूप से मिलता है। वृक्षों में देवी-देवताओं की उपस्थिति को दर्शाया गया है। सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्पष्ट रूप से परिलक्षित किया गया है और इसका साक्षात प्रमाण हमारे धर्म ग्रन्थ रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद गीता जैसे शास्त्रों के रूप में हमारे पास है। इसे इन पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है- “वनस्पतिं पवमान मध्वा समङ्गिधार्य। सहस्र वल्शम् हरितं भ्राजमानं हिरण्यं।।” अर्थात् हे सोम देवता! तुम अपनी मधुमयी धारा से इस धरती को सींच दो, जो सहस्र शाखाओं से युक्त है, जो हरी-भरी है तथा स्वर्ण से बनी होने के कारण अत्यंत प्रकाशवान है। इसी प्रकार महाभारत में उल्लेख मिलता है कि- "एको वृक्षो हियो ग्रामे भवेत् पर्ण फ़लन्वितह:। चैत्यो भवति निर्ग्य तिरर्च्नियः सुपूजितः।।" अर्थात् जो वृक्ष पत्तों तथा फ़लों से संपन्न हो, वह पूजनीय है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति तथा प्रकृति प्रदत्त चीजों का बहुत महत्त्व है। प्रकृति की पूजा का भी विधान है। पूजा के समय जो पंचामृत बनाया जाता है, उसमें दूध, दही, घी, चीनी तथा शहद मिलाया जाता है। इसका धार्मिक तथा वैज्ञानिक महत्त्व है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों तथा शास्त्रों में प्रकृति, पर्यावरण एवं जीवनोपयोगी जिन नियमों के पालन के लिए कहा गया है, वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सिद्ध है। विविध व्रत-उपवास एवं नियमों के माध्यम से शरीर को शुद्ध रखना, ये भी इन्हीं में शामिल है। सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण को न देखना, मूर्ति स्पर्श न करना तथा ग्रहण काल में भोजन ग्रहण न करना, इसका भी वैज्ञानिक कारण यह है कि इस समय भोजन दूषित हो जाता है। दूषित भोजन शरीर के लिए हानिकारक है। ग्रहण देखना आँखों के लिए हानिकारक हो सकता है। वहीं अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ग्रहणकाल में देवता कष्ट में होते हैं। अतः मूर्ति स्पर्श वर्जित है। इसीलिए इसे विविध राशियों से सबंधित करके इसके अनुकूल तथा प्रतिकूल प्रभावों के बारे में बात की जाती है। नदियों तथा ग्रहों की पूजा आदि धार्मिक क्रियाएँ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। नदियों को जीवनदायिनी माना गया है। अब तो यह बात वैज्ञानिक दृष्टि से भी सिद्ध हो चुकी है कि पूर्णिमा के चन्द्रमा का प्रकाश तथा सूर्य की कोमल व सुखद रश्मियाँ मनुष्य के लिए मानसिक तथा शारीरिक रूप से लाभकारी हैं। अतः इनके पूजन का विधान है, ताकि कुछ समय मनुष्य इनके संपर्क में आकर अपने शरीर को पुष्ट कर सके। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय धार्मिक भावनाएँ तथा नियम जितने धार्मिक हैं, उतने ही वैज्ञानिक भी हैं। कोई भी नियम अनावश्यक रूप से नहीं बनाया गया है। अतः इसे वैज्ञानिक रूप से देखना तथा मानना अनिवार्य है।

Key Words

प्रकृति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जीवनदायिनी, पंचामृत, अनुकूल पूजनीय, प्रकाशवान, सहस्र, सर्वव्यापकता, विचारवान, परिलक्षित, सहेजने, मानसिक, रश्मियाँ, अनुकूल, जलवायु, वृक्षारोपण आदि ।

Cite This Article

"स्वच्छ पर्यावरण के लिए सार्थक प्रयास: अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अवधारणा", International Journal of Emerging Technologies and Innovative Research (www.jetir.org), ISSN:2349-5162, Vol.11, Issue 3, page no.b24-b31, March-2024, Available :http://www.jetir.org/papers/JETIR2403104.pdf

ISSN


2349-5162 | Impact Factor 7.95 Calculate by Google Scholar

An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 7.95 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator

Cite This Article

"स्वच्छ पर्यावरण के लिए सार्थक प्रयास: अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अवधारणा", International Journal of Emerging Technologies and Innovative Research (www.jetir.org | UGC and issn Approved), ISSN:2349-5162, Vol.11, Issue 3, page no. ppb24-b31, March-2024, Available at : http://www.jetir.org/papers/JETIR2403104.pdf

Publication Details

Published Paper ID: JETIR2403104
Registration ID: 533756
Published In: Volume 11 | Issue 3 | Year March-2024
DOI (Digital Object Identifier):
Page No: b24-b31
Country: Indore, MADHYA PRADESH, India .
Area: Arts
ISSN Number: 2349-5162
Publisher: IJ Publication


Preview This Article


Downlaod

Click here for Article Preview

Download PDF

Downloads

000318

Print This Page

Current Call For Paper

Jetir RMS